An Indian Civilizational Perspective

जागता लम्हा

Written by Puneet Khanna

उन दोनो लम्हों का सफर यूं ही अचानक किसी वक़्त शुरू हुआ था, अलग अलग। वो लम्हे अब जवान हो गए थे। जवानी में ही दोनो एक दूसरे का रास्ता काट गए। फिर कुछ दूर जाकर ना जाने क्या सोचा, मगर वापिस लौट आए और बीच रस्ते में दोनो कहीं मिल गए। दोनो ने कुछ देर इंतज़ार किया कि दूसरा लम्हा बोले। और बिना कुछ कहे ही, एक दूसरे का हाथ थामे आगे बढ़ गए। बहुत हसीन होता हसी दो लम्हों का मिलना और मिलकर चलना। दो लम्हे जब मिलकर चलते हैं तो वक़्त के दायरे ख़त्म हो जाते हैं।

वो दोनो लम्हे घड़ी के दोनो हाथों के बीच खेलते कूदते आगे बढ़ने लगे। उन्ही हाथों के साथ दायरा दर दायरा घड़ी के चक्कर लगाते रहे। कूदते फांदते ये लम्हे कब घड़ी के उन हाथों पर जम गए, ये उन्हें भी पता नही चला। असल में उन हाथों की आदत हो गयी थी उन्हें।

उनका मेल जोल अब कम होने लगा था। हर एक घंटे में जब घड़ी के वो दोनो हाथ इकट्ठे होते तो उन लम्हों की भी चार बात हो जाती। शुरू में दोनो इंतज़ार करते थे हर घंटे का। धीरे धीरे इंतज़ार लम्बा होने लगा। राह तकते तकते दोनो में से कोई एक लम्हा अक्सर थक कर सो जाता। इसलिए हाथों के मिलने पर भी वो लम्हे मिल नही पाते थे। और मिलने पर भी ज्यादा सफर तो नाराज़गी में ही कट जाता था।
एक दिन अचानक एक हाथ “6” पर और दूसरा “12” पर रूक गया। वो दोनो लम्हे एक दूसरे का इंतज़ार करते रहे। बहुत दिनों तक। दोनो ने एक दूसरे को बेवफा करार कर दिया और अपने अपने सफर पर निकल पड़े।

नादान! इतना समझ नही पाए की उनका सफर तो अब घड़ी के हाथों में था। उन हाथों में जो रूक गए थे।

आज वो घड़ी मैं एक रिक्शा में भूल आया हूँ। ना जाने किसको मिलेगी। काश! कि जिसे भी मिले, उसे चाबी भरना आता हो। क्या पता वो हाथ फिर से चल पड़े। क्या पता कोई लम्हा अब भी जागता हो!

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