An Indian Civilizational Perspective

वर्तमान की यथार्थता

हम दसवीं कक्षा में पड़ते थे और मुझे हिंदी की कवितायें लिखने में रूचि थी | एक दिन हमारा एक कक्षार्थी सभको कविता लिखने के लिए आमंत्रित कर रहा था | एक कविता प्रतियोगिता के लिए कवितायेँ भेजनी थी स्कूल की ओर से, उसने कहा | मैंने पुछा की में भी कवितायें लिखता हूँ, तुमने मुझे नहीं कहा ? तो उसने उत्तर दिया कि तुम उर्दू के शब्दों का अधिक प्रयोग करते हो इसलिए तुम्हारी कविता ठीक नहीं रहेगी|

तो मैंने ठान लिया कि अबकी बार ऐसी कविता लिखूंगा जो हमारी हिंदी कि अध्यापिका के लिए भी भारी पड़ेगी! देर रात तक बैठ कर मैंने यह कविता लिखी | पहले इस में केवल चार छंद थे | जब मैं दसवीं कक्षा कि सर्वोच्च अध्यापिका के पास यह कविता लेकर गया तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि यह मैंने लिखी है| तो मेरी परीक्षा लेने के मन से उन्होंने मुझे कहा कि यह कविता अभी संपूर्ण नहीं लगती, आप एक और छंद दाल कर लाओ – संभवता दुसरे और तीसरे छंद के बीच में |

मैं फिर बैठ गया और रात को बहुत सोचा | जो भी लिखना था – उसकी शैली और भाषा का स्तर शेष कविता का ही होना था| बहुत सोच के बाद, मैंने “अविरल आभुय्द्य से हुआ….” वाला छंद लिखा | वह अध्यापिका फिर भी न मानी | उन्होंने मेरी हिंदी कि अध्यापिका को लिख कर भेजा “क्या देश ऐसी कविता और ऐसी हिंदी लिख सकता है?”

कुछ घंटों बाद उन्हें उत्तर आया “हाँ, उसकी हिंदी बहुत अच्छी है, मुझे आश्चर्य नहीं हुआ”|

और इस तरह मेरी यह कविता उस प्रतियोगिता के लिए भेजी गयी |

यह कविता लिख कर मैंने जब अपने पिताजी को दिखाई – तो उन्होंने पड़ते ही ऊंचे स्वर में बुलाया | मैं डरते डरते गया तो उन्होंने गुस्से से पुछा ” यह क्या लिखा है? ऐसी कविता कौन लिखता है?” मैं सहम गया और धीरे से बोला “पर मैंने तो भारतेंदु हरिश्चंद्र की शैली में लिखने की कोशिश की थी”

इस पर वो और गुस्सा हो गए और कहा “किसी के मुहं से कभी भारतेंदु की कवितायेँ सुनी हैं? सब कबीर के दोहे बोलते हैं | लिखना है तो वो लिखो जो दुनिया सुने और सुनाये|”

उस रात मैं सोने के लिए लेता हुआ था पर सो नहीं पा रहा था | तभी मेरे पिताजी साथ वाले कमरे में से जाते हुए मेरी माँ के पास रुके और बहुत ख़ुशी से कहने लगे “आज हमारा बेटा कवी बन गया है | उसकी कविता में दम है |”

ठीक १५ दिन बाद (२२ दिसम्बर को) उनका देहांत हो गया | उसके बाद मैं केवल दो कवितायेँ और ही लिख सका – जो अब मेरे पास नहीं हैं|

मेरे पिताजी एम. ए (हिंदी); साहित्य रतन; संपादन कला विशारद थे | भारतीय सरकार में हिंदी ऑफिसर थे और १९५०-६० में उनकी कई कहानियाँ ‘हिंदुस्तान” और “नवभारत टाइम्स” में छपी थीं | उनकी एक कहानी (फेल) को पद कर हिंदुस्तान के संपादक ने लिखा था “देव राज कपूरजी की यह कहानी हिंदी साहित्य में अद्वित्य रहेगी!”

==================

वर्तमान की यथार्थता

उल्ल्हास्पूर्ण मन, ह्रदय कोटि कोटि पुलकित
यौवन लहर लहराए समस्त अंग संपूर्ण जग हर्षित
हर पग पर फूलोत्पन लिए लताएं ललाम
दूर अर्नव पर सूर्य रश्मि से रुचिर नभ स्याम

पूर्व समय का स्मरण है भरा उर्जस्वित वीर गाथाओं से
मातृभूमि हेतु आहुति दी थे वीर पुत्र मातायों के
भरसक प्रयास थे भंवर के पर की नाव प्रवाहिनी पार
ज्योतिर्मय किया विश्व, था जहाँ अँधा अन्धकार अपार

अविरल आभुय्द्य से हुआ आरम्भ, इस स्वर्ग का निर्माण
निज का उतराधिकार है यह अनुपम देश महान,
सोच भीतर हर्षाया अंतरतम ऊंचा हुआ मेरा भाल
पर दरिद्रता और तम में था खो गया वह काल |

करुनामय स्वर लिए दर्द पड़ा कर्ण में कैसा
पल भर में हृयातंत्री झंकृत था प्रभाव ऐसा
ह्रदय वाणी थी अत्याचारों के प्रति लिए कुंठा निराली
विनम्र विलोचन थे उसके अश्रुधारा पश्चात खाली

था गौरवमय भारती का येही सत्य येही यथार्थ
इस उज्जवल भूत भविष्यति का था यह परमार्थ
मुख पर करुना, ह्रदय में सिहरन और क्लान्ति भरा मन,
माती भरा, फटे वस्त्रों से था उसका ढका तन |

~ देश दीपक कपूर
६ दिसम्बर १९८३

Get Drishtikone Updates
in your inbox

Subscribe to Drishtikone updates and get interesting stuff and updates to your email inbox.

4 Comments
  1. garrimaa says

    देश
    कविता पढने से पहले कविता की भूमिका पढ़ी | तरह तरह के भावों से मन भर गया | पहला था हमारे शिक्षकों के प्रति| किस तरह प्रोत्साहन की बजाये वे कभी कभी बच्चों के मन से इस तरह का मज़ाक करते हैं| बहुत कम शिक्षक ऐसे होते हैं जो खुले दिमाग से अपने हर शिष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा दें| उर्दू के कई शब्द हिंदी भाषा में वैसे भी प्रयोग में लाये जाते हैं| सच पूछो तो उर्दू में नज्म लिखना मुझे हिंदी में क्लिष्ट कविता लिखने से ज्यादा प्रिय है क्यूंकि यह रूमानी बहुत लगता है | मेरे एक हिंदी अध्यापक थे | वे काफी अच्छी हिंदी पढ़ाते थे | मैं तब नवमी कक्षा में थी | मैंने सोच लिया था कि हिंदी से बी. ऐ. करुँगी लेकिन उनका तबादला हो गया और किसी और शिक्षक से हिंदी पढने की मुझे कोई इच्छा नहीं हुई| उर्दू और हिंदी का एकसाथ प्रयोग करते हुए बिना लय की कविता को “नयी कविता” कहा जाता है जो हिंदी या कविता के पुराने नियमो से परे है | मुझे वह बहुत अच्छी लगती थी | मैंने आगे चलकर विज्ञान को विषय बना कर पढाई की लेकिन हिंदी और कविता से मेरा विशेष लगाव बना रहा | विगत वर्षों में अंग्रेजी में ही सब पढ़ते-पढ़ते में हिंदी भूलने लगी थी जिसका असर मेरी रचनाओं में देखा जा सकता है | बाल काल की लिखी हुई कविताओं की हिंदी बाद की लिखी कवितों के मुकाबले अव्वल दर्जे की है | खैर आपका यह विवरण पढ़कर मन भर आया | यह जानकार अच्छा भी लगा की आपके पिताजी हिंदी में इतने पारंगत थे और मन विह्वल भी हुआ यह सोच कर कि उनके आकस्मिक देहांत से आपको कितनी ठेस पहुंची होगी | शायद यदि वे आप सबके बीच और रहते तो आप हिंदी से अपना नाता नहीं तोड़ते | आपकी यह कविता न सिर्फ शब्दों कि धनी है बल्कि आपकी संवेदना भी उसमें साफ़ दीख पड़ती है | मेरे विचार से आपको हिंदी की तरफ और कविता की तरफ फिर से लौटना चाहिए | हमारी भाषा बहुत ही प्यारी है और इसमें भावनाओं को ठीक प्रकार से व्यक्त करने की असीम शक्ति भी है | आपने हम सब लोगों की हिंदी कवितों को अपने ब्लॉग साईट पर बहुत बढ़ावा दिया है | हिंदी हमारी सभ्यता और संस्कृति का अनोखा उपहार है | जैसे हमें वेद-पुराणों की रछा करनी है उसी प्रकार अपनी भाषा को भी सहेजना है, आगे बढ़ाना है | वरना बदलते इतिहास में यह भी और कई प्रभावशाली विद्याओं की तरह विलुप्त हो जाएगी | में आपसे इस बारे में आपकी ईमेल पर जल्दी ही चर्चा करना चाहंगी | पिछले दिनों मेरे दिमाग में इस दिशा में एक बहुत ही प्रबल विचार उत्पन्न हुआ है और मैंने उसपर काम करना शुरू भी कर दिया है पर यदि आप, मैं और एक दो और लोग मिल कर यह करें तो काफी अच्छा रहेगा | इस कविता और पृष्ठभूमि को बच्चों की सी सरलता के साथ हम सब के साथ बांटने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद |
    गरिमा

  2. garrimaa says

    देश
    कविता पढने से पहले कविता की भूमिका पढ़ी | तरह तरह के भावों से मन भर गया | पहला था हमारे शिक्षकों के प्रति| किस तरह प्रोत्साहन की बजाये वे कभी कभी बच्चों के मन से इस तरह का मज़ाक करते हैं| बहुत कम शिक्षक ऐसे होते हैं जो खुले दिमाग से अपने हर शिष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा दें| उर्दू के कई शब्द हिंदी भाषा में वैसे भी प्रयोग में लाये जाते हैं| सच पूछो तो उर्दू में नज्म लिखना मुझे हिंदी में क्लिष्ट कविता लिखने से ज्यादा प्रिय है क्यूंकि यह रूमानी बहुत लगता है | मेरे एक हिंदी अध्यापक थे | वे काफी अच्छी हिंदी पढ़ाते थे | मैं तब नवमी कक्षा में थी | मैंने सोच लिया था कि हिंदी से बी. ऐ. करुँगी लेकिन उनका तबादला हो गया और किसी और शिक्षक से हिंदी पढने की मुझे कोई इच्छा नहीं हुई| उर्दू और हिंदी का एकसाथ प्रयोग करते हुए बिना लय की कविता को “नयी कविता” कहा जाता है जो हिंदी या कविता के पुराने नियमो से परे है | मुझे वह बहुत अच्छी लगती थी | मैंने आगे चलकर विज्ञान को विषय बना कर पढाई की लेकिन हिंदी और कविता से मेरा विशेष लगाव बना रहा | विगत वर्षों में अंग्रेजी में ही सब पढ़ते-पढ़ते में हिंदी भूलने लगी थी जिसका असर मेरी रचनाओं में देखा जा सकता है | बाल काल की लिखी हुई कविताओं की हिंदी बाद की लिखी कवितों के मुकाबले अव्वल दर्जे की है | खैर आपका यह विवरण पढ़कर मन भर आया | यह जानकार अच्छा भी लगा की आपके पिताजी हिंदी में इतने पारंगत थे और मन विह्वल भी हुआ यह सोच कर कि उनके आकस्मिक देहांत से आपको कितनी ठेस पहुंची होगी | शायद यदि वे आप सबके बीच और रहते तो आप हिंदी से अपना नाता नहीं तोड़ते | आपकी यह कविता न सिर्फ शब्दों कि धनी है बल्कि आपकी संवेदना भी उसमें साफ़ दीख पड़ती है | मेरे विचार से आपको हिंदी की तरफ और कविता की तरफ फिर से लौटना चाहिए | हमारी भाषा बहुत ही प्यारी है और इसमें भावनाओं को ठीक प्रकार से व्यक्त करने की असीम शक्ति भी है | आपने हम सब लोगों की हिंदी कवितों को अपने ब्लॉग साईट पर बहुत बढ़ावा दिया है | हिंदी हमारी सभ्यता और संस्कृति का अनोखा उपहार है | जैसे हमें वेद-पुराणों की रछा करनी है उसी प्रकार अपनी भाषा को भी सहेजना है, आगे बढ़ाना है | वरना बदलते इतिहास में यह भी और कई प्रभावशाली विद्याओं की तरह विलुप्त हो जाएगी | में आपसे इस बारे में आपकी ईमेल पर जल्दी ही चर्चा करना चाहंगी | पिछले दिनों मेरे दिमाग में इस दिशा में एक बहुत ही प्रबल विचार उत्पन्न हुआ है और मैंने उसपर काम करना शुरू भी कर दिया है पर यदि आप, मैं और एक दो और लोग मिल कर यह करें तो काफी अच्छा रहेगा | इस कविता और पृष्ठभूमि को बच्चों की सी सरलता के साथ हम सब के साथ बांटने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद |
    गरिमा

  3. Vinay says

    साधुवाद,
    तत्सम निष्ठ भाषा की याद दिला गयी आपकी ये कविता.
    ऐसी भाषा यूं तो पढने में थोड़ी क्लिष्ट अवश्य जान पड़ती है, लेकिन इसका कारण भाषा न होकर हमारी हिन्दी और संकृत भाषाओँ से क्रमशः होती दूरी है.
    धन्यवाद कि आपने मुझे मेरे विद्यालय की याद दिला दी जो अपने हिंदी भाषा के दैनंदिन प्रयोग के लिए विख्यात है और जिसके कारण आज भी मैं अपने आपको भाषाई तौर पर निपट अकेला तो नहीं ही पाता हूँ वरन विचार व्यक्त करने में एक अनन्य सहयोगी के रूप में सदैव अपने सन्निकट पाता हूँ.
    गरिमा को भी धन्यवाद जिन्होंने इस कविता के बारे में हमें फेसबुक के माध्यम से परिचित कराया.

    विनीत,
    विनय

  4. Vinay says

    साधुवाद,
    तत्सम निष्ठ भाषा की याद दिला गयी आपकी ये कविता.
    ऐसी भाषा यूं तो पढने में थोड़ी क्लिष्ट अवश्य जान पड़ती है, लेकिन इसका कारण भाषा न होकर हमारी हिन्दी और संकृत भाषाओँ से क्रमशः होती दूरी है.
    धन्यवाद कि आपने मुझे मेरे विद्यालय की याद दिला दी जो अपने हिंदी भाषा के दैनंदिन प्रयोग के लिए विख्यात है और जिसके कारण आज भी मैं अपने आपको भाषाई तौर पर निपट अकेला तो नहीं ही पाता हूँ वरन विचार व्यक्त करने में एक अनन्य सहयोगी के रूप में सदैव अपने सन्निकट पाता हूँ.
    गरिमा को भी धन्यवाद जिन्होंने इस कविता के बारे में हमें फेसबुक के माध्यम से परिचित कराया.

    विनीत,
    विनय

Comments are closed.

Get Drishtikone Updates
in your inbox

Subscribe to Drishtikone updates and get interesting stuff and updates to your email inbox.