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नितिन गडकरी के नाम एक चिट्ठी

मान्यवर श्री नितिन गडकरी जी,

राष्ट्रीय अध्यक्ष,

भारतीय जनता पार्टी,

११ अशोक रोड,

नयी दिल्ली

सादर नमस्कार!

मेरा आपसे व्यक्तिगत परिचय प्राप्त करने का अथवा आपके किसी सार्वजानिक कार्यक्रम में सहभागी हो कर आपके विचार सुनने का सुयोग नहीं हो सका है. परन्तु भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते आप मुझे अपने से लगते हैं. सारा परिवाए संघमय होने कि वजह से मैं काफी हद तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के इतिहास से अवगत हूँ. इसलिए यह साहस बटोर सका हूँ कि आपको भाजपा के सामने आने वाली समस्याओं से आपको अवगत करा कर मार्ग-दर्शन प्राप्त कर सकूं.

मैं प्रायः सन १९९६ (1996) ई. से ही देश के सम्मुख प्रस्तुत राष्ट्रीयता, राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय चेतना का स्वरुप और उसे प्राप्त करने हेतु राष्ट्रबंधुओं का आह्वान और समर्पण के अनेक कार्यक्रमों में सहभागी रहा हूँ.

जब उपरोक्त विचारों के आधार पर भारतीय जनसंघ नामक राजनैतिक संघटन का निर्माण हुआ तो हमारी मानसिकता जैसे अनेक लोगों को अपनी कल्पना साकार होने कि संभावना का आभास होने लगा. क्योंकि उक्त नए राजनैतिक संघटन ‘भारतीय जनसंघ” के निर्माता, निर्देशक एवं नियंत्रक के रूप में डॉ. श्यामा प्रसाद मुख़र्जी, प. दीनदयाल उपाध्याय, श्री जगन्नाथ राव जोशी, श्रीमान सुंदर सिंह भंडारी जी, श्री अटल बिहारी वाजपेयी आदि सामने आये थे, जिनका उद्घोष था,

मैं तो समाज की थाती हूँ,

मैं तो समाज का हूँ गुलाम,

मैं तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता हूँ बलिदान अभय!

इनलोगों का उद्घोष केवल नारा नहीं था, बल्कि वे समाज का संघटित रूप साकार करने में सफल हुए थे. देश को १९४७ में जो आज़ादी मिली, उसके परिणाम स्वरुप देश खंडित ही नहीं हुआ था, देश के विखंडित हिस्से में सत्ताधीशों द्वारा वहां की आबादी लहुलुहान हुई थी. उन्हें मार मार कर निकला गया था. एक तरफ आज़ादी का जशन मनाया जा रहा था और दूसरी तरफ लाखों बेसहारा, हाथ-पैर कटे, अपनी संपत्ति ही नहीं बहु-बेटियाँ तक गवां कर भागे भागे दिल्ली पहुँचने वाली जनसँख्या रेलवे स्टेशन पर पानी के लिए भी तरस गयी थी. ऐसे समय देश में जशन मनाने वाली सरकार और उनके नेताओं का ध्यान भी इधर न था. परन्तु देश में जो छोटा संघटन था, उसके कार्यकर्ताओं ने उन विस्थापित भाई-बंधुओं के लिए घर-घर से रोटी और बाल्टी पानी का प्रबंध कर उनकी तात्कालिक पीड़ा को सहलाने में यथासंभव अग्रणी भूमिका निभाई थी और इस विचार का संघटन के माध्यम से देश के कोने-कोने में उन पीड़ित विस्थापित बांधवों के लिए सहायता और सहयोग का वातावरण बनाया था जहाँ विस्थापित भी स्थापित हो सके थे.

उन अग्रणी मार्गदर्शकों ने समाज के लिए बलिदान का अपना संकल्प आदर्श रूप में प्रकट भी कर दिखलाया था. मा. राजाभाऊ महाकाल गोवा मुक्ति आन्दोलन में पुर्त्गालिओं की गोली खा कर शहीद हो गए. डॉ. श्यामा प्रसाद मुखेर्जी भारतीय शासन की एकता स्थापित करने के आन्दोलन-

एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे-

के नारे के साथ कश्मीर के श्रीनगर जेल में देश को बांटने वाली सत्ता का शिकार हो कर मारे गए. कोई जांच भी नहीं हुई और सत्ताधीशों की साजिश पर पर्दा ही पड़ा रह गया. अटल जी भी उनके साथ ही यातना भुगत रहे थे. मा. दीनदयाल उपाध्याय जी की हत्या किस निर्दयता के साथ हुई यह तो उस समय के मुगलसराय स्टेशन के रेलवे कर्मचारीगण ही बता सकते हैं. जांच का नाटक तो हुआ पर कोई परिणाम नहीं निकला. देश में केन्द्रीय और सभी प्रान्तिक सत्ता कांग्रेस के हाथ में थी, उसके नेताओं के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई. अपराधियों को बेनकाब करने के प्राथमिक दायित्व से उन्होंने बेशर्मी से मुह मोड़ लिया.

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सत्ताधीशों ने भले मुह मोड़ के अपना पल्ला झाड़ लिया पर समाज और जनता उन्हें पहचानने लगी थी. उन बलिदानी नेताओं के बताये मार्ग पर चलने का संकल्प ले चुकी थी. उनका नारा:-

१. भारत एक राष्ट्र है, राज्यों का समूह नहीं.

२. भारत आज भले खंडित कर दिया गया पर यह अखंड हो के रहेगा.

३. इतिहास में कोई सदा के लिए निर्णीत सत्य नहीं है. इतिहास बार बार दोहराता जाता रहा है और आगे भी दोहराता जाता रहेगा.

४. देश के हित में करेंगे काम,

काम के लेंगे पूरे दाम.

५. हर खेत को पानी, हर हाथ को काम,

यह नारा है देश के नाम.

६. देश केअंतिम छोर पर बैठे का उदय प्रथम- अन्त्योदय हमारी प्राथमिकता है.

सर्वसाधारण जनता, अनुभवी वृद्ध पीढ़ी, वरुण और होनहार युवकों कि पीढ़ी ने भारतीय जनसंघ के साथ खड़े हो कर काम करना आरम्भ कर दिया. परिणाम स्वरुप, समाजवादियों के एक क्रियाशील वर्ग ने भी उनका साथ दिया. उस समय के सभी लोग जानते थे और स्वीकार करते थे कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने उत्तर प्रदेश के एक लोकसभा सीट से लोहिया जी के आग्रह पर चुनाव लड़ना स्वीकार कर लिया पर अपनी पराजय कि कीमत पर लोहिया जी को लोक सभा में पहुंचा ही दिया.

धीरे-धीरे भारतीय जनसंघ देश व्यापी होता गया और कांग्रेस कि सत्ता सिमटती गयी. और १९७४ ई. (1974) के लोक सभा चुनाव में जीत के विरुद्ध इंदिरा गाँधी जब कोर्ट से पराजित हो गयी और फिर भी आपातकाल सत्ता मोह में आपातकाल की घोषणा कर सारे संवैधानिक अधिकार अपने हाथ में लेकर जो लोकतंत्र का मखौल उड़ाया और सभी राजनैतिक दल के नेताओं सहित अपने दल के श्री चंद्रशेखर, श्री रामधन आदि को भी बिना कारण जेल में बंद कर दिया. तथा गैर राजनैतिक अर्थात शुद्ध सामाजिक कार्य करने वाले नेताओं को भी बिना कारण सींखचों में बंद कर दिया. यहाँ तक कि राजनीति से पूरी तरह संन्यास ले कर भूदान आन्दोलन में संलग्न जयप्रकाश नारायण पर भी लाठियां बरसाई जिसे माननीय नाना देशमुख जी ने अपनी पीठ पर रोक कर उनकी जान बचाई तो वो भी कांग्रेसी दमन के विरुद्ध सभी राजनैतिक दलों कि एकता स्थापित करने में आगे आगये. उन्होंने सभी दलों से देश में कांग्रेसी तानाशाही से मुक्ति पाने के लिए बलिदान माँगा. तो बाकी राजनैतिक दल अपनी अगर-मगर में लगे रहे, राजनैतिक नफे-नुक्सान का हिसाब लगाने में बैठकें करते रहे. पर भारतीय जनसंघ के पुरोधाओं ने एक स्वर में कह दिया-“जयप्रकाश जी! देश महान है, पार्टियां नहीं. पार्टियां तो बनती-बिगडती रहती हैं.” भारतीय जनसंघ ने २३ वर्षों से निरंतर “तमसो मा ज्योतिर्गमय” का सन्देश देने वाले अपने दीपक को बुझा कर अपनी आहुति दे दी.

परन्तु दुसरे दलों ने खुले मन से नहीं;सत्ता समीकरण के भविष्य में होने वाली लाभ-हानि के विचार को ध्यान में रख कर. फिर भी जयप्रकाश जी के मार्गदर्शन में कुछ राजनैतिक दलों को मिलकर जो जनता पार्टी बनी उसके प्रभाव से अहंकारी सत्ता को मजबूर हो कर आपातकाल समाप्त कर देश में चुनाव करना पड़ा, जिसमे कांग्रेस को अकल्पनीय पराजय को स्वीकार करना पड़ा. देश में पुनः लोकतंत्र कि स्थापना हो सकी. जनता पार्टी कि सरकार बनी तो पुराने जनसंघ के नेताओं में से श्री अटल बिहारी वाजपयी, श्री लाल कृष्ण आडवाणी, श्री नानाजी देशमुख को मंत्रीमंडल में शामिल होने का निमंत्रण दिया. लेकिन नानाजी देशमुख ने मंत्रिपद लेने से इनकार कर दिया और केवल सामाजिक कार्यों से जनजीवन कि समस्या के निदान में लग कर कार्य करने का संकल्प ले लिया. राजनीति से पूरी तरह संन्यास लेने के बावजूद उन्होंने जो गोंडा जिले और चित्रकूट के नवासियों के बीच रह कर हर हाथ को काम में लगा कर जनजीवन में जो परिवर्तन कर दिखाया, वह सबके लिए आदर्श प्रेरणा सिद्ध हुई.

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जनता पार्टी के लोग आपसी खींचतान में लग गए और कुछ लोगों कि निजी महत्वाकांक्षा ने जनता पार्टी की सरकार ही नहीं गिराई, जनता पार्टी का सतीत्व विखंडित हो गया. फिर जनसंघ से प्रेरणा पा कर सुसंस्कारित व्यक्तियों ने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की और राजनीति के कीचड़ में भी निर्दोष, निष्कलंक, बेदाग़ जीवन से समाज की सेवा करने का संकल्प लेकर सदा निर्मल, पुष्पित, सुवासित, जीवन पुष्प ही राष्ट्र देव के चरणों पर अर्पित करने का व्रत लिया और उसके प्रतीक स्वरुप ही कमल को अपनी पार्टी का चुनाव का चिन्ह बनाया. इससे जहाँ कार्यकर्ताओं का लक्ष्य निर्धारण हुआ, वहीँ समाज में भी विशवास उत्पन्न हुआ और राजनैतिक दलों में फैली व्यक्ति वादी महत्वाकांक्षा को भी चुनौती मिली. इतनी शशक्त नींव होने पर इमारत भी मजबूत होती है. यही कारन है कि भाजपा इतनी तेज़ी से एक राष्ट्रीय दल बन कर उभरा.

आज जब मैं जन संघ के बारे में पढता हूँ और उसके नए स्वरुप भारतीय जनता पार्टी को देखता हूँ तो मन में उदासी छा जाती है. भाजपा के सामने कोई लक्ष्य को न पा के मेरा मन दुखी हो उठता है. पार्टी एक आतंरिक कलह के अन्धकार में समाती जा रही है. ऐसे में भला देश कि सुध बुध कौन ले? आपने झारखण्ड में शिबू सोरेन जैसे भ्रष्ट नेता की सरकार को समर्थन दिया. जब आपको मौका मिला तो आपने वहां अपनी सरकार भी नहीं बनायी. भारतीय जनता पार्टी एक सफल विपक्ष की भूमिका भी नहीं निभा पा रही. आप आज भी उन पुराने मुद्दों पे अटके हुए हैं. पार्टी का कोई युवा चेहरा नहीं होने के कारण युवाओं के बीच भी आप लोकप्रिय नहीं हो रहे हैं. पूरा देश जानता था की शिक्षा संस्थानों में आरक्षण का मुद्दा गलत है, पर आपकी पार्टी तक ने वोटों के लालच में इसका विरोध नहीं किया. ऐसे में कोई आप पर भरोसा कैसे करे? जब से आप अध्यक्ष बने हैं आपके पुराने समर्थकों में हर्ष की लहर दौड़ गयी. पर अभी तक मुझे भाजपा में कोई विशेष अंतर नहीं दिख पा रहा है. मैं आपसे नम्र निवेदन करना चाहता हूँ कि कृपा करके देश को बताएं कि अब आपकी पार्टी का लक्ष्य क्या है? क्यूँ युवा आपका समर्थन करें? क्यूँ आपको दोबारा सरकार बनाने का मौका मिले? क्यूँ आपको “Party with a difference” कहा जाए? ऐसे में पार्टी अपने पुराने लोगों का विश्वास भी खोती जा रही है.

उम्मीद करता हूँ कि इन प्रश्नों का उत्तर दे के आप अपने पुराने लोगों से दोबारा जुड़ पायेंगे और नए लोग भी आपकी ओर आकर्षित होंगे.

आपका शुभाभिलाषी,

हिमांशु शेखर

नयी दिल्ली-110034

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Desh Kapoor

The panache of a writer is proven by the creative pen he uses to transform the most mundane topic into a thrilling story. Desh - the author, critic and analyst uses the power of his pen to create thought-provoking pieces from ordinary topics of discussion. He writes on myriad interesting themes. Read the articles to know more about his views and "drishtikone".

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