An Indian Civilizational Perspective

असत्य की पहचान

असत्य की पहचान में ही असत्य से मुक्ति है

अगर सदा असत्य को ही सत्य माना हो और अपने असत्य को असत्य के रूप में जाना ही न हो तो असत्य में जीवन भटकेगा. पर जब यह हमने जान ही लिया कि इतने देर से जो संजोये बैठे थे वो निरा असत्य था, तो उसका साथ देना असंभव हो जायेगा.

दुनिया में मुश्किल इस बात की नहीं है की लोग सत्य का साथ नहीं देते, परन्तु कठिनता तो यह है कि वो असत्य को पहचान ही नहीं पाते. असंख्य विचारों और असंख्य व्यवधानों में सही क्या है और क्या नहीं, यह पहचान लेना सरल नहीं. क्यूंकि जो भी कसौटी होगी वो उन्ही विचारों से निर्मित होगी जिनको परखना है.

असत्य को असत्य से कैसी कोई परखे? जब तक जीवन में सत्य जान ने की और घटिक उथले से जीवन से आगे जाने की लालसा इतनी प्रबल न हो जाये, कि न रुके बने और न पुरानी राह पर चलते, तब कहीं जाकर मनुष्य असत्य के समक्ष खड़ा होता है. समक्ष आने में ही कई जीवन निकल जाते हैं. इतना कर लेने में ही मुक्ति का द्वार है.

आगे बड़ना जीवन की सच्चाई है. पल पल की सत्यता को विचारों से एक धागे में पिरोने का नाम ही जीवन है. अगर किसी एक पल में हम संपूर्ण सृष्टि तो देख सकें – एक पल से दुसरे पल के ठीक बीच – तो जीवन वहीँ संपूर्ण हो जाये. बीते हुए पल की कृत्रिम वास्तविकता, जो उन्हीं विचारों की उपज है जिनको वह देखने का प्रयास करतें हैं, वर्त्तमान का सत्य कैसे होंगे? और सत्य केवल वर्तमान में ही होगी. जो विचारों का बंधी हो वो मुक्त कैसे होगा?

दुसरे का बुना जाल हो तो निकला भी जाये. खुद ही तिनका तिनका एक कर बुना हुआ जाल हो तो कोई कैसे निकले?

ऐसा नहीं कि सत्य “अच्छा” है और असत्य ‘बुरा”. अव्यशक यह है कि हम अपने को हर पल कि सत्यता का अनुभव से वंचित रख लेते हैं. आम खाया ही न हो तू उसकी मिठास का विवरण असंभव है.

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